23 साल की खदान के लिए 300 साल की खेती उजाड़ना विकास नहीं, विनाश है- सुदेश टीकम
खैरागढ. शनिवार को हजारों किसानों के साथ हुए विशाल विरोध प्रदर्शन के दौरान किसान नेता सुदेश टीकम ने मीडिया से बातचीत में श्री सीमेंट की प्रस्तावित सण्डी चूना पत्थर खदान का तीखा विरोध जताया। टीकम ने साफ कहा कि 11 दिसंबर को निर्धारित पर्यावरणीय जनसुनवाई को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि यह जमीन केवल खेत नहीं बल्कि किसानों की जीवन रेखा है।
टीकम ने कहा कि दनिया–अतारिया–सण्डी क्षेत्र तीन फसली खेती वाला इलाका है, जहां केवल किसान ही नहीं, बल्कि हजारों मजदूरों की आजीविका चलती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तीन फसली उपजाऊ जमीन पर कंक्रीट का जंगल खड़ा नहीं किया जा सकता। यह सिर्फ किसानों का मामला नहीं, यह आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है।
खदान 23 साल चलेगी, लेकिन जमीन 300 साल की विरासत है
जब पत्रकारों ने क्षेत्र में 1000 एकड़ नए खनन टेंडर (हनईबन–जगमड़वा क्षेत्र) पर सवाल पूछा, तो सुदेश टीकम का जवाब बेहद तीखा और सटीक था। उन्होंने कहा—“23 या 25 साल में खदान खत्म हो जाएगी, लेकिन यह जमीन 200–300 साल से लोगों की आजीविका का आधार है और सैकड़ों साल आगे भी रह सकती है। क्या नीति-निर्धारक यह संतुलन नहीं देख पा रहे?
उन्होंने विकास के नाम पर खनन को अंधाधुंध अपनाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि वैज्ञानिक अध्ययन और सामाजिक न्याय को नज़रअंदाज़ करना देश के लिए खतरनाक है।
अगर राष्ट्रपति भवन के नीचे हीरा मिले तो क्या उसे भी खोद डालेंगे?—टीकम का कटाक्ष
टीकम ने नीतिगत निर्णयकर्ताओं पर तीखा व्यंग्य कसते हुए कहा— अगर राष्ट्रपति भवन के नीचे हीरे या मोती का भंडार मिल जाए तो क्या उसे भी उखाड़ देंगे? विकास का मतलब हवस नहीं है। सोच-विचार, अध्ययन और जनभावना भी कोई चीज होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि खनन से बनने वाला रोजगार सीमित और अस्थायी होता है, जबकि खेती स्थायी आजीविका देती है।
23 साल की खदान के लिए 300 साल की खेती उजाड़ देना किसी भी लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं है।
जनभावना सर्वोपरि है—लोकतंत्र में जनता की बात सुनी जानी चाहिए सुदेश टीकम ने कहा कि सरकार को जनता की इच्छा का सम्मान करना चाहिए। हम लोकतांत्रिक देश हैं। यहां रहने वाले लोगों की राय, भय, उम्मीद—सब कुछ मायने रखता है। बिना उनकी सहमति तीन फसली जमीन पर खदान थोपना नीतिगत रूप से गलत है। उन्होंने सरकार को दूसरे विकल्प ढूंढने की सलाह दी।
सुदेश टीकम का बयान किसानों के आंदोलन की दिशा और तीव्रता को और मजबूत करता दिख रहा है। जनसुनवाई की तारीख नज़दीक आने के साथ ही संघर्ष और तेज होने की संभावना है।