जियो टैग से लेकर हाजिरी तक सब फर्जी — सिवनीकला में गरीब के सपनों का घर बना घोटाले का अड्डा

जियो टैग से लेकर हाजिरी तक सब फर्जी — सिवनीकला में गरीब के सपनों का घर बना घोटाले का अड्डा

जनपद पंचायत खैरागढ़ के सिवनीकला में कम पढ़े-लिखे हितग्राही रामानंद बने सिस्टम की लापरवाही और धोखाधड़ी के शिकार

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ग्राम पंचायत चंगुर्दा के आश्रित ग्राम सिवनीकला निवासी रामानंद को वर्ष 2018-19 में पक्का मकान बनाने के लिए मंजूरी मिली थी, लेकिन सिस्टम की लापरवाही और कुछ लोगों की साजिश के चलते वह आज तक पक्के घर से वंचित हैं। हैरानी की बात यह है कि बिना घर बने ही उनके खाते में तीनों किश्तों की राशि जारी हो गई, और बिना जानकारी के 1,30,000 रुपए भी रहस्यमय तरीके से निकाल ली गई।

यह पूरा मामला तब सामने आया जब मीडिया को इसकी भनक लगी और सरकार के भौतिक सत्यापन दल (पीएम आवास 2.0) ने गांव का निरीक्षण किया। जांच में पाया गया कि पोर्टल पर मकान पूर्ण दिखाया गया है, जबकि मौके पर एक ईंट तक नहीं लगी थी।

बिना घर बने जारी हो गई पूरी राशि

मामले की शुरुआत तब हुई जब आवास मित्र उमेश निवासी गातापार जंगल ने रामानंद के पुराने कच्चे घर का फोटो खींचकर आवास योजना के पोर्टल में अपलोड किया। इसके बाद पहली किश्त की राशि सीधे पंजाब नेशनल बैंक खाता क्रमांक ******8329 में भेज दी गई। लेकिन रामानंद, जो कम पढ़े-लिखे ग्रामीण हैं, उन्हें यह तक मालूम नहीं था कि उनके खाते में सरकार की ओर से राशि आई है।

जियो टैग’ के नाम पर फर्जीवाड़ा 

इस बीच, फर्जी तरीके से दूसरे और तीसरे जियो टैग (जमीन पर घर का फोटो प्रमाण) अपलोड किए गए, जबकि वास्तविकता में जमीन पर कोई निर्माण कार्य हुआ ही नहीं था। इन फर्जी जियो टेक के आधार पर बाक़ी की दो किश्तें भी जारी हो गईं।

खाते से निकली रकम, पर लाभार्थी अनजान

जब मीडिया ने मामले की तहकीकात की तो खुलासा हुआ कि रामानंद के खाते से किश्तों की रकम निकाली जा चुकी है, लेकिन उन्होंने स्वयं कभी पैसा नहीं निकाला। पासबुक में कैश निकासी की एंट्रियां दर्ज हैं, पर यह स्पष्ट नहीं है कि रकम किसने निकाली। रामानंद ने बताया कि वह कम पढ़ा लिखा है। बैंक में पैसा आया या गया, इसके बारे में मुझे जानकारी नहीं। मेरे नाम से पैसा आया और निकल गया — यह मुझे अब जाकर पता चला है। मेरे घर का एक भी फोटो नहीं खींचा गया, फिर भी कहा जा रहा है कि मकान पूरा बन गया।

पंचायत और जनपद स्तर पर उलझा जवाब

ग्राम पंचायत सचिव पुनऊ धुर्वे ने सफाई दी कि वर्ष 2019 में ही पैसा ट्रांसफर हुआ था। उन्होंने बताया कि कई बार रामानंद को कहा गया कि पैसा आ गया है, निर्माण शुरू करें, लेकिन लाभार्थी ने इंकार किया कि उसके खाते में कोई पैसा नहीं आया।

सचिव का यह भी कहना है कि पंचायत के पास इस आवास का कोई दस्तावेज नहीं है आवास का रिकॉर्ड जनपद पंचायत में होता है, पंचायत केवल निगरानी करती है। फर्जी जियो टैग किसने किया, इसकी जांच ऊपर के स्तर पर होनी चाहिए।

फर्जी जियो टैग को लेकर जिम्मेदारी टलती रही

पूर्व आवास मित्र उमेश ने माना कि उन्होंने केवल प्रारंभिक कच्चे मकान का फोटो खींचा था, पर आगे के जियो टैग उनके द्वारा नहीं किए गए। उन्होंने बताया कि सरकार परिवर्तन के बाद आवास मित्रों को काम से हटा दिया गया था। जबकि दूसरा और तीसरा जियो टैग 2020 के आसपास किया गया, जब मैं काम में नहीं था।

मनरेगा की फर्जी हाजिरी भरी 

यही नहीं, इस आवास के नाम पर मनरेगा के तहत 90 दिवस की मजदूरी भी जारी कर दी गई। जबकि रामानंद ने खुद काम नहीं किया, और न ही कोई निर्माण स्थल मौजूद था। वहीं रोजगार सहायक थुकेल मरकाम ने कहा कि उनसे गलती से गलत हाजिरी भर गई थी, लेकिन जियो टैग उन्होंने नहीं किया। इस मामले में मनरेगा की 90 दिवस की मजदूरी भी फर्जी निकली है।

मामले की जानकारी मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। आप बता रहे हैं, तो निश्चित रूप से मैं इस विषय में जानकारी लेकर जांच कराऊंगा।

प्रेम कुमार पटेल, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत खैरागढ़-छुईखदान-गंडई